Monday, April 17, 2017

तेरा रामजी करेंगे बेड़ा पार ....



मैं साेनू निगम का आभार प्रकट करना चाहती हूं। उनकी वजह से आज मैंने दिनभर वे सारे भजन सुने, एक ज़माने में जिन्हें सुनकर तक़रीबन हर सुबह मेरी आंख खुला करती थी।
सोनू भाई आप भी आज ये सुनिए....बहुत सकून मिलेगा। 
अज़ान से उपजा सारा ग़ुस्सा ग़ायब हो जाएगा।

http://raagtune.net/song/4h963ebn/Tera_Ram_Ji.html


अब सुनिए उस ज़माने की बात जब हर सुबह हमें  भजन, कीर्तन, अज़ान और गुरबानी नसीब हुआ करती थी।
मेरठ में हमारे घर से एक किलोमीटर के दायरे में ही मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारा था। भोर से भी पहले, सबसे पहले मंदिर से भजन शुरू होते, जिसमें तेरा रामजी करेंगे बेड़ा पार, स्वीकारो मेरे प्रणाम, मैली चादर ओढ़ के... (तब पता नहीं था कि भजन गायक हरिओम शरण हैं)आदि शामिल थे।

गुरबानी और अज़ान कुछ देर की देरी से शुरू होती। सर्दियों में ये आवाज़ें और ज़्यादा क़रीब से आती लगती थीं। जैसे रज़ाई का कोना उठाकर, कान तक आ गई हों।

ये सब हमारी ज़िंदगी का हिस्सा थे। कौन क्यों कब गा रहा है, किस आवाज़ से हम डिस्टर्ब हो रहे हैं, मुझे नहीं याद ऐसा कोई मामला मेरी याद से गुज़रा हो। मुझे वो सारे भजन, गुरबानी लगभग कंठस्थ हो चुकी थीं। बहुत । 

पढ़ाई पूरी हुई और शहर छूट गया। तब से लेकर अब तक कभी मुझे ये तीन आवाज़ें इतने सुर में एक साथ सुनने को नहीं मिलीं।


 और अब वो ज़माना बीत चुका है। आवाज़ें, जो सकून पहुंचातीं थीं, फूहड़ शोर में बदल चुकी हैं। 
हम सब बदलने लगे हैं। हमें याद आने लगा कि इन तीनों में से एक वो आवाज़ ही बुलंद होनी चाहिए जिससे हमारा वास्ता है। बाक़ी दोनों को ख़ामोश हो जाना चाहिए।


एक बार सोचिए हम इस बदलाव को अफ़ोर्ड कर सकते हैं क्या ...? 



फ़िलहाल सिर्फ़ दिल की बात।
लाउड स्पीकर्स की आवाज़ों पर क़ाबू होना चाहिए...पर फिर कभी। 






 




Tuesday, June 14, 2016

मेरे गांव के बनियों का पलायन किसके सर है साहेब ?



गांव-औरंगनगर राड़धना। तहसील सरधना। जि़ला मेरठ।
यही पता था जिस पर हम बचपन में ख़त लिखा करते थे।

मेरा ननिहाल।
देखा जाए तो वो मेरी मां का गांव है। इत्तेफ़ाक़न मेरी और मां की  जन्मभूमि एक ही है।

ये राजपूतों की चौबीसी है। बहुसंख्यक राजपूत लेकिन बनिए, जैन और मुसलमानों के अलावा दलितों की भी ख़ासी आबादी थी एक ज़माने में वहां।


हर साल गर्मियों की छुटि्टयों में वहां जाया करते थे।  मिठ्‌ठन बनिया, जयंती हलवाई और भी न जाने कितने ऐसे दुकानदार जिनके पुरखे गांव में जाने कब से आबाद थे। कुछ ज़मींदार तो कुछ व्यापारी। सब खाते पीते लोग थे।
या तो उस उम्र में समझ नहीं आता था या फिर सचमुच वो दाैर अच्छा था। सब बड़े प्यार से रहते थे।

गर्मियों में जब खेतों से गेहूं घर आते तो एक हिस्सा बच्चों का निकाला जाता था।
हम सब उस गेहूं के बदले चुस्की, बिस्कुट, नमकीन और मिठाई तक खरीदा करते थे। 
मामा के घर से लगती दीवार वाला घर कांति बनिए का था।
भरा-पूरा परिवार। कैसी कैसी  रौनकें थीं ..।
सबके घर ख़ूब आना जाना।
 गांव में एक दिगंबर जैनियों का एक पुराना मंदिर था।

लेकिन ये सब पुरानी बातें हैं। ये सब कुछ  था, है नहीं।

सारे बनिए उजाड़ दिए गए। सारे जैन पलायन कर गए। ज्यादातर मुसलमान भाग गए। दलितों में से भी बहुत लोग अब वहां से जा चुके हैं।
दबंगई, लूट, मारपीट, बेइज्ज़ती, डकैती और बदमाशी से डर कर सब चले गए।
 जो दिन में रामराम करके सामने से गुज़रते वही रात को मुंह पर कपड़ा बांधकर लूटने आ जाते।
 कितने दिन जीते डरकर ?  धीरे-धीरे सब चले गए।
अब न वहां जयंती हलवाई का ख़ालिस मावे का पेड़ा मिलता है न  गेहूं बार्टर करके ली गई छोटी-छोटी चीजे़ं।
बनियों के घर-घेर सब ख़ाली हैं। कुछ पर क़ब्ज़े भी हो चुके हैं।
जैनियों ने अपना मंदिर आबाद रखने के लिए एक पुजारी को तनख़्वाह पर रखा है। जो मंदिर के सामने ही किराने की दुकान चलाता है।

जो लोग अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने के लिए गए, सो तो गए, लेकिन जो डरकर भागे या भगा दिए गए उनके पलायन की भी कोई लिस्ट बनी है क्या ?



नोट : ये गांव बीजेपी विधायक संगीत सोम का क्षेत्र है। 

Wednesday, September 23, 2015

अलविदा दोस्त सैय्यद हैदर इमरान रिज़वी

कभी दिन यूं भी निकलता है कि बेवजह उदासी घिरी रहे। आप बाज़ार जाएं और बिना कुछ ख़रीदे वापस आ जाएं। लोगों से बात करें पर ये याद तक न रहे कि सिलसिला क्या है। जैसे आप हों या और न भी हों। कभी यूं भी लगे कि आंख बस अब छलकी। ज़ब्त किए आप दिन गुज़ार देते हैं। सारे काम करते हैं। और तभी पता चलता है कि एक इंसान जिसे आप जानते तक नहीं थे, ये सारी उदासी उसकी वजह से थी।
आज ऐसा ही हुआ। सुबह से उदासी तारी रही। हालांकि सारे काम किए लेकिन तो भी, बेकली बनी रही। अभी कुछ देर पहले पता चला कि सैय्यद हैदर इमरान रिज़वी नहीं रहे। मैं उन्हें जानती नहीं थी। उनकी वॉल पर जाकर देखा तो पता चला कि उन्होंने कभी मुझे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी थी जो मेरे पास पेंडिंग थी। वॉल पर ढेर सारे शोक संदेश थेे। इमरान इस दुनिया से जा चुके हैं। वे जॉनपुर के थे और कुछ ही दिन पहले दिल्ली आए थे। 
मैंने उनकी तस्वीर देखी। एक ज़िंदादिल सा दिखता युवक। जो अब जा चुका है। 
...तो आंख में दो आंसू इस नाम के थे आज दिन भर से ...?  शायद हां । 
इमरान की वॉल पर ऊपर मुझे नज़र आ रहा था -
सैय्यद हैदर इमरान रिज़वी सेंट यू ए फ्रेंड रिक्वेस्ट - कंफर्म/डिलीट 

दोस्त ....मैंने आपकी रिक्वेस्ट कंफर्म कर दी। हालांकि अब इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, फिर भी । 
अलविदा सैय्यद हैदर इमरान रिज़वी । 

Wednesday, September 2, 2015

हम तो अफ़लातून हैं..


-एक इंसान को चारा काटने की मशीन में डालकर काट दिया गया था।
-एक आरोपी को भीड़ ने पीट- पीटकर फांसी चढ़ा दिया था।
रुकिए ..मुझे याद आ रही हैं कुछ और तस्वीरें।
-हरियाणा में एक नेपाली युवती को वहशियाना तरीके से मार डाला गया रेप के बाद।  लड़की मानसिक रूप से बीमार थी।
-एक दलित औरत को नंगा करके गांव भर में घुमाया गया। उसके नंगे जिस्म में पीछे की तरफ़ हाथ बंधे थे। खबर थी कि उसे पेशाब भी पिलाया गया।
-5 औरतों को डायन बताकर मार डाला गया।
-बाग़पत में दो बहनों पर रेप का फ़रमान पंचायत ने सुनाया।
-प्रोफेसर कलबुर्गी को घर में घुसकर मार डाला गया। 

ये बहुत कम है जनाब, जो होता है जो हो रहा है उसे गिनने बैठे तो आप हांफ़ जाएंगे ...।

 लेकिन हम तो अहिंसक हैं, हम तो सभ्य हैं, हम तो शांतिप्रिय हैं। हम तो सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं,  हम तो अफ़लातून हैं ...हम अन्य देशों को सभ्यता का पाठ पढ़ाने के लिए ही बने हैं।









Thursday, July 23, 2015

हसीं सितम...



कल रात एक किताब ऑनलाइन ऑर्डर करना चाह रही थी। प्रकाशक पाकिस्तान लाहौर में हैं। मैंने ऑर्डर किया। किताब की क़ीमत थी पाकिस्तानी 600 रुपए। मुझे लगा बहुत हुआ तो हज़ार रुपए हिंदुस्तानी देने होंगे। आज जवाब आया कि किताब तो 14 दिन में पहुंच जाएगी लेकिन इसके लिए देने होंगे 24 US $.। 
मैंने फिर अमेज़न पर देखा तो एक और बड़ा झटका लगा। वहां इस किताब की क़ीमत दिखी $ 60.35. 
अचानक मुझे तीन साल पहले लाहौर के अनारकली बाज़ार का वो वाकया याद आ गया जहां मैं एक जोड़ी झुमके की क़ीमत 1200 रुपए चुका रही थी। मैंने पूछा-भाई हमारे यहां तो ये तीन चार सौ रुपए में मिल जाएंगे। भाई बोला-बाजी आप ठीक कह रही हैं। आपके यहां तो इतने के ही मिलेंगे लेकिन हम तक तो ये वाया दुबई पहुंचे हैं, अब आप देखिए ये झुमके कहां से कहां होते हुए यहां तक पहुंचे हैं। 
दोनों बातें मुझे हैरान करती हैं , बहुत हैरान।
 

Thursday, April 9, 2015

एक बड़ी चुप का हिस्सा हो जाना


मां ने पूछा-मंहगाई बढ़ती है तो अब लोग सड़कों पर क्यों नहीं निकलते? हमारे ज़माने में तो लोग हंगामा किया करते थे। महंगाई पर तो फिल्म तक बनी थी रोटी कपड़ा और मकान...। बात छोटी पर सच थी। हम सचमुच  चुप रहते हैं। जुल्म होते देखकर भी, सहकर भी चुप रहते हैं। इसमें मैं भी शामिल हूं। हम सब एक बड़ी चुप का हिस्सा चुपचाप बनते जा रहे हैं।

चलिए चित्तूर पर भी चुप रहते हैं।जैसे इससे पहले चुप रहते आए हैं।