Tuesday, June 14, 2016

मेरे गांव के बनियों का पलायन किसके सर है साहेब ?



गांव-औरंगनगर राड़धना। तहसील सरधना। जि़ला मेरठ।
यही पता था जिस पर हम बचपन में ख़त लिखा करते थे।

मेरा ननिहाल।
देखा जाए तो वो मेरी मां का गांव है। इत्तेफ़ाक़न मेरी और मां की  जन्मभूमि एक ही है।

ये राजपूतों की चौबीसी है। बहुसंख्यक राजपूत लेकिन बनिए, जैन और मुसलमानों के अलावा दलितों की भी ख़ासी आबादी थी एक ज़माने में वहां।


हर साल गर्मियों की छुटि्टयों में वहां जाया करते थे।  मिठ्‌ठन बनिया, जयंती हलवाई और भी न जाने कितने ऐसे दुकानदार जिनके पुरखे गांव में जाने कब से आबाद थे। कुछ ज़मींदार तो कुछ व्यापारी। सब खाते पीते लोग थे।
या तो उस उम्र में समझ नहीं आता था या फिर सचमुच वो दाैर अच्छा था। सब बड़े प्यार से रहते थे।

गर्मियों में जब खेतों से गेहूं घर आते तो एक हिस्सा बच्चों का निकाला जाता था।
हम सब उस गेहूं के बदले चुस्की, बिस्कुट, नमकीन और मिठाई तक खरीदा करते थे। 
मामा के घर से लगती दीवार वाला घर कांति बनिए का था।
भरा-पूरा परिवार। कैसी कैसी  रौनकें थीं ..।
सबके घर ख़ूब आना जाना।
 गांव में एक दिगंबर जैनियों का एक पुराना मंदिर था।

लेकिन ये सब पुरानी बातें हैं। ये सब कुछ  था, है नहीं।

सारे बनिए उजाड़ दिए गए। सारे जैन पलायन कर गए। ज्यादातर मुसलमान भाग गए। दलितों में से भी बहुत लोग अब वहां से जा चुके हैं।
दबंगई, लूट, मारपीट, बेइज्ज़ती, डकैती और बदमाशी से डर कर सब चले गए।
 जो दिन में रामराम करके सामने से गुज़रते वही रात को मुंह पर कपड़ा बांधकर लूटने आ जाते।
 कितने दिन जीते डरकर ?  धीरे-धीरे सब चले गए।
अब न वहां जयंती हलवाई का ख़ालिस मावे का पेड़ा मिलता है न  गेहूं बार्टर करके ली गई छोटी-छोटी चीजे़ं।
बनियों के घर-घेर सब ख़ाली हैं। कुछ पर क़ब्ज़े भी हो चुके हैं।
जैनियों ने अपना मंदिर आबाद रखने के लिए एक पुजारी को तनख़्वाह पर रखा है। जो मंदिर के सामने ही किराने की दुकान चलाता है।

जो लोग अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने के लिए गए, सो तो गए, लेकिन जो डरकर भागे या भगा दिए गए उनके पलायन की भी कोई लिस्ट बनी है क्या ?



नोट : ये गांव बीजेपी विधायक संगीत सोम का क्षेत्र है। 

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