Wednesday, September 23, 2015

अलविदा दोस्त सैय्यद हैदर इमरान रिज़वी

कभी दिन यूं भी निकलता है कि बेवजह उदासी घिरी रहे। आप बाज़ार जाएं और बिना कुछ ख़रीदे वापस आ जाएं। लोगों से बात करें पर ये याद तक न रहे कि सिलसिला क्या है। जैसे आप हों या और न भी हों। कभी यूं भी लगे कि आंख बस अब छलकी। ज़ब्त किए आप दिन गुज़ार देते हैं। सारे काम करते हैं। और तभी पता चलता है कि एक इंसान जिसे आप जानते तक नहीं थे, ये सारी उदासी उसकी वजह से थी।
आज ऐसा ही हुआ। सुबह से उदासी तारी रही। हालांकि सारे काम किए लेकिन तो भी, बेकली बनी रही। अभी कुछ देर पहले पता चला कि सैय्यद हैदर इमरान रिज़वी नहीं रहे। मैं उन्हें जानती नहीं थी। उनकी वॉल पर जाकर देखा तो पता चला कि उन्होंने कभी मुझे फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी थी जो मेरे पास पेंडिंग थी। वॉल पर ढेर सारे शोक संदेश थेे। इमरान इस दुनिया से जा चुके हैं। वे जॉनपुर के थे और कुछ ही दिन पहले दिल्ली आए थे। 
मैंने उनकी तस्वीर देखी। एक ज़िंदादिल सा दिखता युवक। जो अब जा चुका है। 
...तो आंख में दो आंसू इस नाम के थे आज दिन भर से ...?  शायद हां । 
इमरान की वॉल पर ऊपर मुझे नज़र आ रहा था -
सैय्यद हैदर इमरान रिज़वी सेंट यू ए फ्रेंड रिक्वेस्ट - कंफर्म/डिलीट 

दोस्त ....मैंने आपकी रिक्वेस्ट कंफर्म कर दी। हालांकि अब इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, फिर भी । 
अलविदा सैय्यद हैदर इमरान रिज़वी । 

Wednesday, September 2, 2015

हम तो अफ़लातून हैं..


-एक इंसान को चारा काटने की मशीन में डालकर काट दिया गया था।
-एक आरोपी को भीड़ ने पीट- पीटकर फांसी चढ़ा दिया था।
रुकिए ..मुझे याद आ रही हैं कुछ और तस्वीरें।
-हरियाणा में एक नेपाली युवती को वहशियाना तरीके से मार डाला गया रेप के बाद।  लड़की मानसिक रूप से बीमार थी।
-एक दलित औरत को नंगा करके गांव भर में घुमाया गया। उसके नंगे जिस्म में पीछे की तरफ़ हाथ बंधे थे। खबर थी कि उसे पेशाब भी पिलाया गया।
-5 औरतों को डायन बताकर मार डाला गया।
-बाग़पत में दो बहनों पर रेप का फ़रमान पंचायत ने सुनाया।
-प्रोफेसर कलबुर्गी को घर में घुसकर मार डाला गया। 

ये बहुत कम है जनाब, जो होता है जो हो रहा है उसे गिनने बैठे तो आप हांफ़ जाएंगे ...।

 लेकिन हम तो अहिंसक हैं, हम तो सभ्य हैं, हम तो शांतिप्रिय हैं। हम तो सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं,  हम तो अफ़लातून हैं ...हम अन्य देशों को सभ्यता का पाठ पढ़ाने के लिए ही बने हैं।









Thursday, July 23, 2015

हसीं सितम...



कल रात एक किताब ऑनलाइन ऑर्डर करना चाह रही थी। प्रकाशक पाकिस्तान लाहौर में हैं। मैंने ऑर्डर किया। किताब की क़ीमत थी पाकिस्तानी 600 रुपए। मुझे लगा बहुत हुआ तो हज़ार रुपए हिंदुस्तानी देने होंगे। आज जवाब आया कि किताब तो 14 दिन में पहुंच जाएगी लेकिन इसके लिए देने होंगे 24 US $.। 
मैंने फिर अमेज़न पर देखा तो एक और बड़ा झटका लगा। वहां इस किताब की क़ीमत दिखी $ 60.35. 
अचानक मुझे तीन साल पहले लाहौर के अनारकली बाज़ार का वो वाकया याद आ गया जहां मैं एक जोड़ी झुमके की क़ीमत 1200 रुपए चुका रही थी। मैंने पूछा-भाई हमारे यहां तो ये तीन चार सौ रुपए में मिल जाएंगे। भाई बोला-बाजी आप ठीक कह रही हैं। आपके यहां तो इतने के ही मिलेंगे लेकिन हम तक तो ये वाया दुबई पहुंचे हैं, अब आप देखिए ये झुमके कहां से कहां होते हुए यहां तक पहुंचे हैं। 
दोनों बातें मुझे हैरान करती हैं , बहुत हैरान।
 

Thursday, April 9, 2015

एक बड़ी चुप का हिस्सा हो जाना


मां ने पूछा-मंहगाई बढ़ती है तो अब लोग सड़कों पर क्यों नहीं निकलते? हमारे ज़माने में तो लोग हंगामा किया करते थे। महंगाई पर तो फिल्म तक बनी थी रोटी कपड़ा और मकान...। बात छोटी पर सच थी। हम सचमुच  चुप रहते हैं। जुल्म होते देखकर भी, सहकर भी चुप रहते हैं। इसमें मैं भी शामिल हूं। हम सब एक बड़ी चुप का हिस्सा चुपचाप बनते जा रहे हैं।

चलिए चित्तूर पर भी चुप रहते हैं।जैसे इससे पहले चुप रहते आए हैं।