मैं साेनू निगम का आभार प्रकट करना चाहती हूं। उनकी वजह से आज मैंने दिनभर वे सारे भजन सुने, एक ज़माने में जिन्हें सुनकर तक़रीबन हर सुबह मेरी आंख खुला करती थी।
सोनू भाई आप भी आज ये सुनिए....बहुत सकून मिलेगा।
अज़ान से उपजा सारा ग़ुस्सा ग़ायब हो जाएगा।
http://raagtune.net/song/4h963ebn/Tera_Ram_Ji.html
अब सुनिए उस ज़माने की बात जब हर सुबह हमें भजन, कीर्तन, अज़ान और गुरबानी नसीब हुआ करती थी।
मेरठ में हमारे घर से एक किलोमीटर के दायरे में ही मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारा था। भोर से भी पहले, सबसे पहले मंदिर से भजन शुरू होते, जिसमें तेरा रामजी करेंगे बेड़ा पार, स्वीकारो मेरे प्रणाम, मैली चादर ओढ़ के... (तब पता नहीं था कि भजन गायक हरिओम शरण हैं)आदि शामिल थे।
गुरबानी और अज़ान कुछ देर की देरी से शुरू होती। सर्दियों में ये आवाज़ें और ज़्यादा क़रीब से आती लगती थीं। जैसे रज़ाई का कोना उठाकर, कान तक आ गई हों।
ये सब हमारी ज़िंदगी का हिस्सा थे। कौन क्यों कब गा रहा है, किस आवाज़ से हम डिस्टर्ब हो रहे हैं, मुझे नहीं याद ऐसा कोई मामला मेरी याद से गुज़रा हो। मुझे वो सारे भजन, गुरबानी लगभग कंठस्थ हो चुकी थीं। बहुत ।
पढ़ाई पूरी हुई और शहर छूट गया। तब से लेकर अब तक कभी मुझे ये तीन आवाज़ें इतने सुर में एक साथ सुनने को नहीं मिलीं।
और अब वो ज़माना बीत चुका है। आवाज़ें, जो सकून पहुंचातीं थीं, फूहड़ शोर में बदल चुकी हैं।
हम सब बदलने लगे हैं। हमें याद आने लगा कि इन तीनों में से एक वो आवाज़ ही बुलंद होनी चाहिए जिससे हमारा वास्ता है। बाक़ी दोनों को ख़ामोश हो जाना चाहिए।
एक बार सोचिए हम इस बदलाव को अफ़ोर्ड कर सकते हैं क्या ...?
फ़िलहाल सिर्फ़ दिल की बात।
लाउड स्पीकर्स की आवाज़ों पर क़ाबू होना चाहिए...पर फिर कभी।